भक्तामर स्तोत्र। Bhaktamar Stotra PDF Free Download

दोस्तों अगर आप Bhaktamar Stotra PDF को सर्च कर रहे हैं तो आपको भक्तामर स्तोत्र का pdf इस लेख में निचे मिल जायेगा जिसे आप निःशुल्क अपने मोबाइल या लैपटॉप में डाउनलोड कर सकते हैं।

Bhaktamar Stotra PDF जैन धर्म से सम्बंधित एक संस्कृत में लिखित धर्म ग्रन्थ है। जिस की रचना 7वीं शताब्दी में आचार्य मनतुंग ने की थी। आज के लेख को पूरा पढ़ने के बाद आपको भक्तामर स्तोत्र की पूरी जानकारी प्राप्त हो जाएगी। तो इस लेख को अंत तक ज़रूर पढ़े।

Bhaktamar Stotra PDF Overview

PDF NameBhaktamar Stotra PDF (भक्तामर स्तोत्र )
No. of Pages9
PDF Size100 KB
Languageहिंदी /संस्कृत
PDF Categoryधार्मिक
PDF CreditMultiple Sourse
DownloadAvailable

Bhaktamar Stotra PDF Download

Bhaktamar Stotra (भक्तामर स्तोत्र )

भक्तामर स्तोत्र 7वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध विद्वान और कवि आचार्य मानतुंग के द्वारा रचित एक पवित्र जैन प्रार्थना पाठ है। यह पाठ जैन धर्म के पहले तीर्थंकर, भगवान आदिनाथ या ऋषभनाथ को समर्पित एक भक्ति स्तोत्र है।

भक्तामर स्तोत्र मूल रूप से संस्कृत में बना है और इसमें 48 श्लोक हैं, जिसका प्रत्येक श्लोक भगवान आदिनाथ से जुड़े गुणों, और चमत्कारों का वर्णन करता है। भक्तामर स्तोत्र की जटिल रचना और उसके श्लोको की सुंदरता इसकी प्रसिद्धि का मूल कारण है 

भक्तामर स्तोत्र को कई खंडों में विभाजित किया गया है, जिसमें प्रत्येक खंड में एक विशिष्ट लयबद्ध पैटर्न दिखता हुआ प्रतीत होता है। ऐसी मान्यता है की भक्तामर स्तोत्र में भगवान आदिनाथ के आशीर्वाद को प्राप्त करने और आध्यात्मिक उत्थान लाने की शक्ति है।

भक्तामर स्तोत्र जैन भक्तों द्वारा प्रार्थना और ध्यान के रूप में पढ़ा या गाया जाता है। अक्सर जैन मंदिरों में, धार्मिक समारोहों के दौरान और व्यक्तिगत अभ्यास के रूप में इसका उच्चारण किया जाता है Bhaktamar Stotra PDF का लिंक ऊपर दिया है जहा से आप इसे डाउनलोड कर सकते हैं।

भक्तामर स्तोत्र पढ़ने के फायदे। Benefit Of Bhaktamar stotra Reading

ऐसी मान्यता है की भक्तामर स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से मनुष्य के असाध्य रोग (कैंसर , अलसर ) जैसी बीमारियों से मुक्ति मिलती है। भक्तामर स्तोत्र में कुल 48 श्लोक है

और प्रत्येक श्लोक में मन्त्र शक्ति निहित है। इसके 45वें श्लोक को खास तौर पर बहुत ही शक्तिशाली माना जाता है। इसके अलावा भक्तो को भक्तामर स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में सुख और शांति प्राप्त होता है।

भक्तामर स्तोत्र पढ़ने की विधि :

Bhaktamar stotra पढ़ने की कोई खास विधि नहीं है तथा इसे दिन के किसी भी समय पढ़ा जा सकता है। बस इसको पढ़ने से पहले एक साफ स्थान का चयन करे और स्नान या पवित्र होने के बाद ही भक्तामर स्तोत्र को पढ़ने की कोशिश करें।

इसके श्लोको को ध्यान और पूरी तन्मयता के साथ पढ़ने की कोशिश करें क्युकी ये श्लोक संस्कृत भाषा में है अतः इसका अच्छे से पठन करने के बाद ही इसका पाठ करें ताकि गलती की गुंजाईश न रहे।

वरना अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। Bhaktamar Stotra PDF का लिंक ऊपर दिया गया है जिसे आप अपने मोबाइल में अवश्य डाउनलोड कर ले।

Bhaktamar Stotra PDF Lyrics (भक्तामर स्तोत्र संस्कृत )

सर्व विघ्न उपद्रवनाशक 

भक्तामर प्रणत- मौलि-मणि-प्रभाणा-

मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।

सम्यक्प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादा-

वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥१॥

शत्रु तथा शिरपीडा नाशक

यः संस्तुतः सकल-वांग्मय-तत्त्वबोधा-

दुभूत- बुद्धि-पटुभिः सुरलोक-नायै ।

स्तोत्रैर्जगत्त्रितय. चित-हरै रुदारै:,

स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥2॥

सर्वसिद्धिदायक

बुद्धया विनापि विबुधाचित-पाद- पीठ,

स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोहम् ।

बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-

मन्य क इच्छति जनः सहसा यहीतुम् ॥3॥

जलजंतु निरोधक

वक्तुं गुणान् गुण-समुद्रः शशांक-कांता,

कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोपि बुद्धया ।

कल्पांत-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं,

को वा तरीतु-मलमम्बु निधिं भुजाभ्याम् ||4||

नेत्ररोग निवारक

सोहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश,

कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृतः ।

प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य्यं मृगी मृगेन्द्रं,

नाभ्येति किं निज-शिशोः परि-पालनार्थम् ॥5॥

विद्या प्रदायक

अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,

त्वद्भक्ति-रेव-मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।

यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति,

तच्चाम्र-चारु कालिका निकरक हेतु ॥6॥

सर्व विष व संकट निवारक

त्वत्संस्तवेन भव-संतति- सन्निबद्धं

पापं क्षणात्क्षय-मुपैति शरीर-भाजाम् ।

आक्रांत-लोक-मलिनील-मशेष-माशु,

सूर्याशु-भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम् ॥7॥

सर्वारिष्ट निवारक

मत्वेति नाथ तव संस्तवनं मयेद-

मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात् ।

चेतो हरिष्यति सतां नलिनी- दलेषु,

मुक्ताफल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दुः ॥8॥

सर्वभय निवारक

आस्तां तव स्तवन- मस्त समस्त-दोषं,

त्वत्संकथापि जगतां दुरितानि हंति ।

दूरे सहस्त्र-किरणः कुरुते प्रभव,

पद्माकरेषु जलजानि विकास-भांजि ॥9॥

कूकर विष निवारक

नात्यद्भुत भुवन-भूषण-भूतनाथ,

भूतैर्गुणैर्भुवि भवंत-मभिष्टु-वंतः ।

तुल्या भवंति भवतो ननु तेन किं वा,

भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥10॥

इच्छित आकर्षक

दृष्ट्वा भवंत-मनिमेष- विलोकनीय,

नान्यत्र तोष-मुपयाति जनस्य चक्षुः ।

पीत्वा पयः शशिकर-दयति- दुग्ध-सिन्धो,

क्षारं जलं जलनिधे रसितुं क इच्छेत् ॥11॥

हस्तिमद निवारक

यैः शांत-राग-रुचिभिः परमाणु-भिस्त्वं,

निर्मापितस्त्रि-भुवनैक-ललाम भूत ।

तावंत एव खलु तेप्यणवः पृथिव्यां,

यते समान-मपरं न हि रूपमस्ति ||12|

चोर भय व अन्यभय निवारक

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरगनेत्र- हारि,

निःशेष- निर्जित-जगत्त्रित-योपमानम् ।

बिम्ब कलंक मलिनं क्व निशाकरस्य,

यद्वासरे भवति पाण्डु-पलाश-कल्पम् ॥13॥

आधि-व्याधि-नाशक लक्ष्मी प्रदायक

सम्पूर्ण मण्डल- शशांक-कला कलाप-

शुभा गुणास्त्रिभुवनं तव लग्घयति ।

ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर नाथमेक,

कस्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टम् ||14|

राजसम्मान-सौभाग्यवर्धक

चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभि-

नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम्

कल्पांत काल मरुता चलिता चलेन

किं मन्दराद्रि-शिखरं चलितं कदाचित् ॥ 15

सर्व-विजय-दायक

निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैलपूरः,

कृत्स्नं जगत्वयमिदं प्रकटी-करोषि

गम्यों न जातु मरुतां चलिता-चलाना,

दीपोपरस्त्वमसि नाथ! जगत्प्रकाशः ॥16॥

सर्व उदर पीडा नाशक

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहु-गम्यः,

स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगति ।

नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभावः,

सूर्यातिशायि महिमासि मुनीन्द्र लोके ॥17॥

शत्रु सेना स्तम्भक

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं ।

गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम् ।

विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्प- कांति,

विद्योतयज्- जगदपूर्व-शशांक- विम्बम् ॥18॥

जादू-टोना प्रभाव नाशक

किं शर्वरीषु शशिनान्हि विवस्वता वा,

युष्मन्मुखेन्दु- दलितेषु तमःसु नाथ ।

निष्पन्न- शालि वन- शालिनी जीव-लोके,

कार्य कियज-जलधरैर्जल-भारनमैः ॥19॥

संतान-लक्ष्मी-सौभाग्य-विजय बुद्धिदायक

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाश

नैवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु ।

तेजःस्फुरन्मणिषु याति यथा महत्वं,

नैव तु काच-शकले किरणाकुलेपि ॥20॥

सर्व वशीकरण 

मन्ये वरं हरि- हरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:,
कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि॥ 21॥

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥ 22॥

प्रेत बाधा निवारक

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-
मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात्।
त्वामेव सम्य – गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥ 23॥

शिर पीडा नाशक

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माणमीश्वर – मनन्त – मनङ्ग – केतुम्।
योगीश्वरं विदित – योग-मनेक-मेकं,
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥ 24॥

नज़र (दृष्टि देष) नाशक 

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,
त्वं शङ्करोऽसि भुवन-त्रय- शङ्करत्वात् ।
धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्,
व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥ 25॥

तुभ्यं नमस् – त्रिभुवनार्ति – हराय नाथ!
तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल -भूषणाय।
तुभ्यं नमस् – त्रिजगत: परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय॥ 26॥

शत्रुकृत हानि निरोधक 

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !
दोषै – रुपात्त – विविधाश्रय-जात-गर्वै:,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि॥ 27॥

सर्व कार्य सिद्धि दायक

उच्चै – रशोक- तरु – संश्रितमुन्मयूख –
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम्।
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं,
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति॥ 28॥

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम्।
बिम्बं वियद्-विलस – दंशुलता-वितानं
तुङ्गोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥ 29॥

शत्र स्तम्भक

कुन्दावदात – चल – चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपु: कलधौत -कान्तम्।
उद्यच्छशाङ्क- शुचिनिर्झर – वारि -धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥ 30॥

छत्र-त्रयं तव विभाति शशाङ्क- कान्त-
मुच्चै: स्थितं स्थगित-भानु-कर-प्रतापम्।
मुक्ता – फल – प्रकर – जाल-विवृद्ध-शोभं,
प्रख्यापयत्-त्रिजगत: परमेश्वरत्वम्॥ 31॥

गम्भीर – तार – रव-पूरित-दिग्विभागस्-
त्रैलोक्य – लोक -शुभ – सङ्गम -भूति-दक्ष:।
सद्धर्म -राज – जय – घोषण – घोषक: सन्,
खे दुन्दुभि-र्ध्वनति ते यशस: प्रवादी॥ 32॥

सर्व ज्वर नाशक

मन्दार – सुन्दर – नमेरु – सुपारिजात-
सन्तानकादि – कुसुमोत्कर – वृष्टि-रुद्धा।
गन्धोद – बिन्दु- शुभ – मन्द – मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा॥ 33॥

गर्व रक्षक

शुम्भत्-प्रभा- वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोक – त्रये – द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती।
प्रोद्यद्- दिवाकर-निरन्तर – भूरि -संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम्॥34॥

स्वर्गापवर्ग – गम – मार्ग – विमार्गणेष्ट:,
सद्धर्म- तत्त्व – कथनैक – पटुस्-त्रिलोक्या:।
दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य:॥ 35॥

सम्पत्ति-दायक

उन्निद्र – हेम – नव – पङ्कज – पुञ्ज-कान्ती,
पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:,
पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति॥ 36॥

दुर्जन वशीकरण

इत्थं यथा तव विभूति- रभूज् – जिनेन्द्र !
धर्मोपदेशन – विधौ न तथा परस्य।
यादृक् – प्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,
तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि॥ 37॥

हाथी वशीकरण

श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल,
मत्त- भ्रमद्- भ्रमर – नाद – विवृद्ध-कोपम्।
ऐरावताभमिभ – मुद्धत – मापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्॥ 38॥

सिंह भय निवारक

भिन्नेभ – कुम्भ- गल – दुज्ज्वल-शोणिताक्त,
मुक्ता – फल- प्रकरभूषित – भूमि – भाग:।
बद्ध – क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि,
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते॥ 39॥

अग्नि भय निवारक

कल्पान्त – काल – पवनोद्धत – वह्नि -कल्पं,
दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल – मुत्स्फुलिङ्गम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख – मापतन्तं,
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥

सर्प विष निवारक

रक्तेक्षणं समद – कोकिल – कण्ठ-नीलम्,
क्रोधोद्धतं फणिन – मुत्फण – मापतन्तम्।
आक्रामति क्रम – युगेण निरस्त – शङ्कस्-
त्वन्नाम- नागदमनी हृदि यस्य पुंस:॥ 41॥

युद्ध भय निवारक

वल्गत् – तुरङ्ग – गज – गर्जित – भीमनाद-
माजौ बलं बलवता – मपि – भूपतीनाम्।
उद्यद् – दिवाकर – मयूख – शिखापविद्धं
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति॥ 42॥

कुन्ताग्र-भिन्न – गज – शोणित – वारिवाह,
वेगावतार – तरणातुर – योध – भीमे।
युद्धे जयं विजित – दुर्जय – जेय – पक्षास्-
त्वत्पाद-पङ्कज-वनाश्रयिणो लभन्ते॥ 43॥

भयानक-जल-विपत्ति नाशक

अम्भोनिधौ क्षुभित – भीषण – नक्र – चक्र-
पाठीन – पीठ-भय-दोल्वण – वाडवाग्नौ।
रङ्गत्तरङ्ग -शिखर- स्थित- यान – पात्रास्-
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति ॥ 44॥

सर्व भयानक रोग नाशक

उद्भूत – भीषण – जलोदर – भार- भुग्ना:,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:।
त्वत्पाद-पङ्कज-रजो – मृत – दिग्ध – देहा,
मर्त्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा:॥ 45॥

आपाद – कण्ठमुरु – शृङ्खल – वेष्टिताङ्गा,
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट – जङ्घा:।
त्वन्-नाम-मन्त्र- मनिशं मनुजा: स्मरन्त:,
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति॥ 46॥

सर्व भय निवारक

मत्त-द्विपेन्द्र- मृग- राज – दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर – बन्ध -नोत्थम्।
तस्याशु नाश – मुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते॥ 47॥

मनोवांछित सिद्धिदायक

स्तोत्र – स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,
भक्त्या मया रुचिर-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं,
तं मानतुङ्ग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी:॥ 48॥

Download the Bhaktamar Stotra PDF link provide in the start of the blog .

Bhaktamar Stotra PDF Video

Conclusion/सारांश

दोस्तों आप को आज के लेख में भक्तामर स्तोत्र के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त हो गई होगी तथा Bhaktamar Stotra PDF भी मिल गया होगा जिसे आप अपने मोबाइल में डाउनलोड कर के भक्तामर स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।

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FAQs Of Bhaktamar Stotra PDF

भक्तामर स्तोत्र की रचना किसने की थी?

भक्तामर स्तोत्र की रचना 7वीं शताब्दी में आचार्य मानतुंग ने की थी

भक्तामर स्तोत्र का क्या महत्व है?

 भक्तामर स्तोत्र भगवान आदिनाथ को समर्पित एक पवित्र जैन प्रार्थना है। जिसके पठन से भगवन आदिनाथ के आशीर्वाद को प्राप्त करने और आध्यात्मिक उत्थान के लिए पढ़ा या गाया जाता है।

भक्तामर स्तोत्र में कितने श्लोक हैं ?

भक्तामर स्तोत्र में कुल 48 श्लोक है जिसका प्रत्येक श्लोक भगवन आदिनाथ के गुणों और चमत्कारों का वर्णन करता है

भक्तामर स्तोत्र की भाषा क्या है?

भक्तामर स्तोत्र मूल रूप से संस्कृत भाषा में है जिसे आज के समय में कई भाषाओ में अनुवाद किया जा चूका है।

Bhaktamar Stotra PDF को कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?

Bhaktamar Stotra PDF को आप pdfsewa.in वेबसाइट से प्राप्त कर सकते है जोकि पूरी तरह से निःशुल्क है।

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