श्री सत्यनारायण व्रत कथा। Satyanarayan Katha PDF Free download 2023

आज के लेख में हम आपको Satyanarayan Katha PDF निःशुल्क में देने वाले हैं। जिसका लिंक निचे दिया गया है जिस पर क्लिक करके आप सत्यनारायण कथा को अपने मोबाइल या लैपटॉप में डाउनलोड कर सकते हैं।

सत्यनारायण कथा हिन्दू धर्म में बहुत महत्व रखती है तथा हर हिंदू धर्म को मानने वाला व्यक्ति सत्यनारायण की कथा ज़रूर सुनता है। आज के लेख में आपको सत्यनारायण कथा के बारे में सारी जानकारी मिलने वाली है , तो इस लेख को अंत तक ज़रूर पढ़िएगा और Satyanarayan Katha PDF को निचे दिए गए लिंक से डाउनलोड भी कर लीजियेगा।

Satyanarayan Katha PDF Overview

PDF नामSatyanarayan Katha PDF(सत्यनारायण कथा पीडीऍफ़ )
पेज संख्या10
PDF Size2.2 MB
PDF भाषाहिंदी
PDF केटेगरीधार्मिक (Religious )
PDF SourseMultiple Sourse
PDF Download12 मई

Satyanarayan Katha (सत्यनारायण कथा )

सत्यनारायण कथा (जिसे श्री सत्यनारायण व्रतम के नाम से भी जाना जाता है) एक हिंदू अनुष्ठान और भजन पाठ है जो भगवान विष्णु को समर्पित है, । इस कथा को अक्सर भक्तों द्वारा अपने जीवन में आशीर्वाद, सफलता, समृद्धि और खुशी पाने के लिए किया जाता है।

इसके अलावा सत्यनारायण कथा आमतौर पर शादियों, गृहप्रवेश समारोहों और अन्य महत्वपूर्ण ख़ुशी के शुभ अवसरों पर किया जाता है। सत्यनारायण अनुष्ठान में भगवान सत्यनारायण और उनके भक्त की कहानी का वर्णन किया जाता है, जिसके बाद पूजा (पूजा) और प्रसाद (पवित्र भोजन) की दिया जाता है।

आपको बता दे कि सत्यनारायण कथा की उत्पत्ति स्कंद पुराण से हुई है, जो हिंदू धर्म के अठारह प्रमुख पुराणों में से एक है। सत्यनारायण कथा  हिंदू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और दुनिया भर के भक्तों द्वारा बड़ी भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है।इस कथा को हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है 

सम्पूर्ण सत्यनारायण कथा 5 अध्याय में लिखी गई है जिसमे कुल 170 श्लोक शामिल है। सत्यनारायण कथा को संस्कृत भाषा में ही लिखा गया है अब इसका अनुवाद कई भाषाओ में उपलब्ध है। दोस्तों Satyanarayan Katha PDF को आप निचे दिए गए लिंक से जरूर डाउनलोड कर लें।

सत्यनारायण कथा/पूजा करने की विधि

सत्यनारायण पूजा एक हिंदू अनुष्ठान है जो आमतौर पर विशेष अवसरों जैसे शादियों, गृहप्रवेश समारोहों और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर किया जाता है। सत्यनारायण पूजा करने के लिए निम्न चरण का पालन करें। 

तैयारी: पूजा कक्ष या पूजा स्थल को गाय के गोबर से साफ करें  और फूलों, रोशनी और अन्य पारंपरिक सजावट से सजा दें । पूजा के लिए एक छोटा मंडप (पूजा की चौकी ) स्थापित करें। इस चौकी के चारो तरफ केले का वृक्ष लगाए तथा ठाकुर जी या सत्यनारायण की मूर्ति स्थापित करें। 

निमंत्रण: भगवान सत्यनारायण की पूजा या कथा सुनाने वाले (पुजारी ) को प्रसाद देकर आमंत्रित करें  जिनकी उपस्थिति से इस कथा/पूजा की शोभा बढ़ जाती है 

प्रसाद: पूजा की शुरुआत देवता को फूल, फल और अन्य सामान चढ़ाने से होती है। इसके बाद दीप और अगरबत्ती जलाते हैं।

कथावाचन: पुजारी या पूजा करने वाला व्यक्ति भगवान सत्यनारायण और उनके भक्त की कहानी सुनाता है। यह सत्यनारायण पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यह भक्तों के लिए सौभाग्य और समृद्धि लाता है।

पूजा: पुजारी या पूजा करने वाला व्यक्ति सत्यनारायण मंत्र का जाप करता है और पूजा करता है, जिसमें फल, फूल और अन्य वस्तुओं का प्रसाद चढ़ाया जाता है । भक्त देवता को मिठाई, नारियल और मौसमी फल भी चढ़ा सकते हैं।

आरती: पूजा का समापन आरती के साथ होता है, जहां भक्त दीपक जलाते हैं और देवता के सामने इसे लहराते हैं। आरती के साथ सत्यनारायण आरती गीत का जाप किया जाता है 

प्रसाद: आरती के पश्तात प्रसाद भक्तों के बीच वितरित किया जाता है, जिसमें आमतौर पर फल, मिठाई और अन्य पारंपरिक व्यंजन शामिल होते हैं। तथा पुजारी जी को वस्त्र दक्षिणा और भोजन करवाया जाता है। तथा भक्त पुजारी जी से आर्शीवाद लेने के बाद स्वय भोजन कर सकते हैं। 

सत्यनारायण कथा पूजा एक सुंदर और सार्थक अनुष्ठान हैजोकि  भक्तों के जीवन में सौभाग्य और समृद्धि लाता है।Satyanarayan Katha PDF को आप निचे दिए गए लिंक से ज़रूर डाउनलोड कर लें।

सत्यनारायण पूजा करने के लाभ (Benefit Of Satyanarayan Katha )

सत्यनारायण कथा को पूरी भक्ति, श्रद्धा और ईमानदारी के साथ करने के कई लाभ होते हैं । सत्यनारायण कथा के लाभ कुछ हम ने निचे दिए है जोकि निम्न है:

भगवान सत्यनारायण का आशीर्वाद: सत्यनारायण कथा सुनने/करने  से भक्ति के साथ साथ भगवान सत्यनारायण का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।जिससे प्रसन्न होकर भगवान सत्यनारायण अपने भक्तों की सारी मनोकामना पूरी करते हैं और उन्हें समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशी का आशीर्वाद देते हैं।

विघ्नों का निवारण : ऐसा माना जाता है की सत्यनारायण कथा को सुनने या करवाने से भक्तों के जीवन से विघ्न और कठिनाइयाँ दूर होती हैं।इसके अलावा यह व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता लाता है और किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।

सुरक्षा: सत्यनारायण कथा भक्तों को किसी भी नुकसान और खतरे से बचाती है।मान्यता के अनुसार भक्ति के साथ सत्यनारायण की पूजा करने से किसी भी बुरी ताकत को दूर करने और भक्तों और उनके परिवारों की रक्षा करने में मदद मिलती है।

आध्यात्मिक विकास: सत्यनारायण कथा को आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देने और मन में शांति और सद्भाव लाने के लिए भी किया जाता है । ऐसी मान्यता है कि यह भक्तों को उनके डर और चिंताओं को दूर करने और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है।

कुल मिलाकर, सत्यनारायण कथा  और धार्मिक अनुष्ठान है जो इसे भक्ति और ईमानदारी के साथ करने वाले भक्तों को कई लाभ पहुंचा सकता है।Satyanarayan Katha PDF को का लिंक निचे दिया गया है। जिसे बनाने इ काफी मेहनत लगी है तो आप इसे ज़रूर डाउनलोड कर लें।

Satyanarayan Katha PDF Download (श्री सत्यनारायण व्रत कथा)

प्रथम अध्याय

एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूतजी महाराज से पूछा महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते है।

श्री सूतजी बोले इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान श्रीकमलापतिजी ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूं, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए पृथ्वीलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश, दुःख भोगते हुए देखा तथा किस उपाय से इनके दुखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक को गये। वहां चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्रवर्ण भगवान श्री नारायणजी का दर्शन कर उन देवाधिदेव की ये स्तुति करने लगे। नारद जी बोले हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य और अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणों से सम्पन्न, भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मना आपको नमस्कार है।

स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग ! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है ? नारद जी बोले भगवन पृथ्वीलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न – योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्रेशों से दुःखी हो रहे हैं। हे नाथ ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें।

श्री भगवान ने कहा हे वत्स संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से – आपने बहुत अच्छी बात पूछी है जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं सुनें । हे वत्स! स्वर्ग और पृथ्वीलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूं। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायणजी का व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सुनकर नारदजी ने कहा प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है ? इसका विधान क्या है ? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए ? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये ।

भगवान ने कहा- यह श्री सत्यनारायणजी व्रत दुःख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस किसी भी दिन भक्ति औरश्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर * सायंकाल में भगवान श्रीसत्यनारायणजी की पूजा करे । नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए । केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी का चूर्ण, शक्कर या गुड़ यह सब योग्य सामग्री C सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए ।

बन्धुबान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवानजी की कथा सुनकर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ।

भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य गीत आदि का आयोजन करें। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर को जायें। ऐसा करनेसे मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में,पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा एवम् सरल उपाय है।

द्वितीय अध्याय

सूतजी ने कहा- “हे ऋषियों! जिन्होंने पहले समय में इस व्रत को किया है उनका इतिहास कहता हूँ आप सब ध्यान से सुनें। सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण भूख और प्यास से बेचैन होकर पृथ्वी पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले श्री विष्णु भगवानजी ने ब्राह्मण को देखकर एक दिन बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण कर ब्राह्मण के पास जाकर आदर के साथ पूछा- “हे विप्रदेव ! तुम नित्य ही दुःखी होकर पृथ्वी पर क्यों घूमते हो ? तब उस ब्राह्मण ने कहा मैं भिक्षा के लिए पृथ्वी पर फिरता हूँ । हे भगवन! यदि आप इससे छुटकारा पाने का कोई उपाय जानते तो कृपा कर मुझे बताएँ । वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किए श्री विष्णुजी ने कहा- “हे ब्राह्मण श्री सत्यनारायण भगवान मनवांछित फल देने वाले हैं। इसलिए तुम उनका पूजन करो, इससे मनुष्य सब दुःखों से मुक्त हो जाता है।” ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले श्री भगवानजी अंतर्ध्यान हो गए। 

जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बताया है, में उसको अवश्य करूंगा, यह निश्चय कर वह ब्राह्मण घर चला गया। अगले दिन वह जल्दी उठा और श्री सत्यनारायणजी का व्रत करने का निश्चय कर मिक्षा माँगने के लिए चल दिया। उस दिन उसको मिक्षा में बहुत धन मिला जिससे उसने पूजा का सामान खरीदा और घर आकर अपने बंधु-बांधवों के साथ श्री सत्यनारायणजी का व्रत किया। इसके करने से वह ब्राह्मण सब दक्ष्यों से भरकर अनेक प्रकार की सुख सम्पत्तियों से युक्त हुआ। तभी से वह विप्र हर मास व्रत करने लगा। इसी प्रकार सत्यनारायणजी के व्रत को जो शास्त्रविधि के अनुसार करेगा, वह सब पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा ।

 आगे भी जो मनुष्य पृथ्वी पर श्री सत्यनारायणजी का व्रत करेगा वह सब दुःखों से छूट जाएगा। इस तरह नारदजी से सत्यनारायण भगवान का कहा हुआ व्रत मैंने आपसे कहा । तब ऋषियों ने कहा- “हे मुनीश्वर । संसार में इस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया | यह हम सब सुनना चाहते हैं। श्री सूतजी ने कहा- “हे मुनियों! जिस-जिस प्राणी ने इस व्रत को किया है उन सबकी कथा सुनो। एक समय वह ब्राह्मण धन और ऐश्वर्य के अनुसार बंधु-बांधवों के साथ व्रत पूजन कर रहा था, कि उसी समय एक लकड़हारा आया। उसने लकड़ियां बाहर रखदीं और विप्र के घर में चला गया। प्यास से व्याकुल लकड़हारे ने विप्र को व्रत करते देखा । वह प्यास को भूल गया। उसने उस विप्र को नमस्कार किया और पूछा- “हे विप्र ! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं ? इस व्रत से क्या फल मिलता है ? कृपा करके मुझे बताएँ ।”

ब्राह्मण ने कहा- “सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह श्री सत्यनारायणजी का व्रत है। इनकी ही कृपा से मेरे यहाँ धन-धान्य आदि की वृद्धि हुई है।” विप्र से इस व्रत के बारे में जानकर वह लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। भगवान का चरणामृत ले और भोजन करने के बाद वह अपने घर को चला गया।

अगले दिन लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज ग्राम में लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से भगवान सत्यनारायणजी का उत्तम व्रतकरूँगा । मन में ऐसा विचार कर वह लकड़हारा लकड़ियां अपने सिरपर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे, वहाँ गया। उस दिन उसे उन लकड़ियों के चौगुने दाम मिले। वह बूढ़ा लकड़हारा अतिप्रसन्न होकर पक्के केले, शक्कर, शहद, घी, दूध, दही और गेहूँ का चूर्ण इत्यादि श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत की सभी सामग्री लेकर अपने घर आ गया। फिर उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधि-विधान के साथ भगवान का पूजा और व्रत किया । उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन-पुत्र आदि से युक्त हुआ और संसार के समस्त सुख भोगकर वैकुंठ को चला गया ।”

       तृतीय अध्याय

श्री सूतजी ने कहा “हे श्रेष्ठ मुनियों अब एक और कथा कहता हूँ । पूर्वकाल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था । प्रतिदिन देवस्थानों पर जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी सुंदर और सती साध्वी थी । भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनों ने श्री सत्यनारायण भगवानजी का व्रत किया। साधु नामक एक वैश्य, राजा को व्रत करते देख उनसे पूछने लगा – हे राजन! भक्तियुक्त चित्त से यह आप क्या कर रहे हैं ? मेरी सुनने की इच्छा है।” तब महाराज उल्कामुख ने कहा “हे साधु वैश्य में अपने बंधु-बांधवों के साथ सन्तान की प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान सत्यनारायण भगवानजी का व्रत व पूजन कर रहा हूँ।” उसने कहा- हे राजन मुझे भी इसका सब विधान बताइए।

 मैं भी आपके कथानुसार इस व्रत को करूंगा। मुझे कोई संतान नहीं है। विश्वास है कि इससे निश्चय ही मेरे यहाँ भी संतान होगी। राजा से सब विधान सुन, व्यापार से निवृत्त हो. वह वैश्य खुशी खुशी अपने घर आया। वैश्य ने अपनी पत्नी लीलावती से संतान देने वाले उस व्रत का समाचार सुनाया और प्रण लिया कि जब हमारे यहाँ यहाँ संतान होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा। एक दिन उसकी पत्नी लीलावती सांसारिक धर्म में प्रवृत्त होकर गर्भवती हो गई। उसने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया । कन्या का नाम कलावती रखा गया। इसके बाद लीलावती ने अपने पति को स्मरण दिलाया कि आपने जो भगवान का व्रत करने का संकल्प किया था अब आप उसे पूरा कीजिए । साधु वैश्य ने कहा “हे प्रिये! मैं कन्या के विवाह पर इस व्रत को करूंगा।

” इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन दे वह व्यापार करने चला गया। काफी दिनों पश्चात वह लौटा तो उसने नगर में सखियों के साथ अपनी पुत्री को खेलते देखा । वैश्य ने तत्काल कलावती के लिए कोई सुयोग्य वर की तलाश की। कंचननगर के एक सुयोग्य वणिक पुत्र से अपने बंधु-बांधवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। वैश्य विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया । इस पर श्री सत्यनारायण भगवान की लीला हुई। अपने कार्य में कुशल साधु नामक वैश्य अपने जामाता सहित नाव को लेकर व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नगर में गया। दोनों ससुर जमाई राजा चंद्रकेतु के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायणजी की माया से प्रेरित एक चोर राजा का धन चुराकर भागा जा रहा था।

 राजा के दूतों को अपने पीछे आते देखकर चोर ने घबराकर राजा के धन को उनकी नाव में रख कर भाग गया, जहाँ ससुर जमाई थे जब राजा के धन को उनकी नाव में रखा देखा तो पकड़कर राजा के समीप जाकर बोले हम ये दो चोर पकड़कर लाए है. आप आज्ञा दे । राजा ने कारागार में डालने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार राजा की आज्ञा से उनको कठिन कारावास में डाल दिया गया तथा उनका धन भी ले लिया । सत्यनारायण भगवानजी की लीला के अनुसारसाधु वैश्य की पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती भी घर पर बहुत दुःखी हुई। उनके घर में रखा धन चोर ले गए। एक दिन शारीरिक व मानसिक पीड़ा तथा भूख-प्यास से अति दुःखित हो भोजन की चिंता में कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा। उसने कथा सुनी तथा प्रसाद ग्रहण कर रात को घर आई। माता ने कलावती से पूछा “हे पुत्री तू अब तक कहाँ रही व तेरे मन में क्या है ?

” कलावती – बोली- “हे माता मैंने श्री सत्यनारायरण भगवान का व्रत होते देखा है।” तब कलावती के वचन सुनकर लीलावती ने सत्यनारायण भगवानजी के पूजन की तैयारी की। उसने परिवार और बंधुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवानजी का पूजन व व्रत किया और वर माँगा कि मेरे पति और दामाद- शीघ्र ही घर लौट आएँ। साथ ही प्रार्थना की कि हम सबका अपराध क्षमा करो। श्री सत्यनारायण भगवानजी इस व्रत से संतुष्ट हो गए। उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा हे राजन! जिन दोनों वैश्यों को तुमने बंदी बना रखा है, वे निर्दोष हैं, उन्हें प्रातः ही छोड़ देना ।” राजा से वचन कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए। प्रातःकाल राजा चंद्रकेतु ने सभा में सबको अपना स्वप्न सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाया जाए। दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा ने उनसे कहा हे महानुभावों तुम्हें भावीवश ऐसा कठिन दुःख प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें कोई भय नहीं है, तुम मुक्त हो। ऐसा कहकर राजा ने उनको नए नए वस्त्राभूषण दीये तथा उनका जितना धन लिया था उससे दूना लौटाकर आदर से विदा किया। दोनों वैश्य अपने घर को चल दिए ।

चतुर्थ अध्याय

श्री सूतजी ने कहा- “वैश्य और उसके जमाई ने मंगलाचार करके यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल पड़े। उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दंडी वेषधारी श्री भगवानजी ने उससे पूछा “हे वैश्य! तेरी नाव में क्या – है ? अभिमानी वणिक हँसता हुआ बोला “हे दंडी ! आप क्यों पूछते हैं ? – क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते भरे हैं।” वैश्य का कठोर वचन सुनकर दंडी रुप मे भगवानजी ने कहा- “तुम्हारा वचन सत्य हो !” ऐसा कहकर वे वहाँ से कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए- दंडी महाराज के जाने के पश्चात वैश्य ने नित्यक्रिया से निवृत्त होने के बाद नाव को उँची उठी देखकर अचंभा किया तथा नाव में बेल-पत्ते आदि देखकर मूर्च्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। होश आने पर अत्यंत शोक प्रकट करने लगा।

 तब उसके जामाता ने कहा “आप शोक न करें यह दंडी महाराज का श्राप है, अतः उनकी शरण में ही चलना चाहिए, तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी।” जामाता के वचन सुनकर दंडी महाराज के पास पहुँचा और भक्तिभाव से प्रणाम करके बोला मैंने जो आपसे असत्य वचन कहे थे उसके लिए मुझे क्षमा करें।” ऐसा कहकर वैश्य रोने लगा । तब दंडी भगवान बोले- “हे वणिक पुत्र मेरी आज्ञा से तुझे बार-बार दुःख प्राप्त हुआ 1 है. तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है।” तब उस ने कहा- हे भगवन आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जान पाते, तब मैं अज्ञानी भला कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइए में अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा कीजिये और पहले के समान मेरी नौका को धन से भर दीजिये। 

उसके भक्तियुक्त वचन सुनकर भगवानजी प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वर देकर अंतर्ध्यान हो गए। तब ससुर व जामाता दोनों ने नाव पर आकर देखा कि नाव धन से परिपूर्ण है। फिर वह भगवान सत्यनारायणजी का पूजन कर जामाता सहित अपने नगर को चला । जब वह अपने नगर के निकट पहुँचा तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा । दूत ने वैश्य के घर जाकर उसकी पत्नी को नमस्कार किया और कहा – “आपके पति अपने दामाद सहित इस नगर के समीप आ गए हैं।” लीलावती और उसकी कन्या कलावती उस समय भगवान का पूजन कर रही थीं । दूत का वचन सुनकर साधु की पत्नी ने बड़े हर्ष के साथ सत्यदेव का__ पूजन पूर्ण किया और अपनी पुत्री से कहा “मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ, तू भी कार्य पूर्ण कर शीघ्र आना।” परंतु कलावती पूजन एवं प्रसाद छोड़कर अपने पति के दर्शन के लिए चली गई । परन्तु उसको पति का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ । नौका को डूबा हुआ तथा कन्या को रोती हुई देख वैश्य दुखित हो बोला- “हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करो।” उसके दीन वचन सुनकर सत्यदेव भगवान प्रसन्न गए । आकाशवाणी हुई- “हे वैश्य! तेरी कन्या प्रसाद छोड़कर आई है, इसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटे तो इसका पति अवश्य मिलेगा ।” आकाशवाणी सुनकर कलावती ने घर पहुँचकर पूजनकर प्रसाद खाया और फिर आकर अपने पति के दर्शन किए। तत्पश्चात वैश्य ने वहीं बंधु-बांधवों सहित सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया। वह इस लोक का सुख भोगकर अंत में स्वर्गलोक को गया ।

    पंचम अध्याय

श्री सूतजी ने आगे कहा – “हे ऋषियों! मैं एक और भी कथा कहता हूँ । प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था । उसने भगवान सत्यदेव का प्रसाद त्याग कर बहुत दुःख पाया। एक समय राजा वन में वन्य पशुओं को मारकर बड़ के वृक्ष के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति भाव से बंधु-बांधवों सहित श्री सत्यनारायणजी का व्रत पूजन करते देखा, परंतु राजा देखकर भी अभिमानवश न तो वहाँ गया और न ही सत्यदेव भगवान को नमस्कार ही किया। जब ग्वालों ने भगवानजी का प्रसाद उनके सामने रखा तो वह प्रसाद त्याग कर अपने नगर को चला गया। नगर में पहुँचकर उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो गया है। 

वह समझ गया कि यह सब भगवान सत्यदेव ने ही किया है। तब वह उसी स्थान पर वापस आया और ग्वालों के समीप गया और विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद खाया तो सत्यनारायणजी की कृपा से सब कुछ पहले जैसा ही हो गया और दीर्घकाल तक सुख भोगकर स्वर्गलोक को चला गया। जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करेगा श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी । निर्धन धनी, बंदी बंधन से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है। संतानहीन को संतान प्राप्त होती है तथा सब मनोरथ पूर्ण होकर अंत में वह बैकुंठ धाम को जाता है। जिन्होंने पहले इस व्रत को किया अब उनके दूसरे जन्म की कथा भी सुनिए । शतानंद नामक ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में जन्म लेकर श्रीकृष्ण की भक्ति कर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नाम के महाराज, राजा दशरथ बने और श्री रंगनाथ का पूजन कर बैकुंठ को प्राप्त हुए। साधु नाम के वैश्य ने धर्मात्मा व सत्यप्रतिज्ञ राजा मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष को प्राप्त हुआ। महाराज तुंगध्वज स्वयं भू मनु हुए। उन्होंने बहुत से लोगों को भगवान की भक्ति में लीन कर मोक्ष प्राप्त किया । लकड़हारा भील अगले जन्म में गुह नामक निषाद राजा हुआ, जिसने भगवान श्रीराम के चरणों की सेवा कर मोक्ष प्राप्त किया। 

आपको ये पांचो अध्याय Satyanarayan Katha PDF में मिल जायेगा। जिसे आप अपने मोबाइल में डाउनलोड करके आसानी से इसका अध्ययन कर सकते हैं।

श्री सत्यनारायण जी की आरती

ओम जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा, सत्यनारायण स्वामी, जन पत्र हरणा ।।

रत्न जडित सिंहासन, अद्भुतछबी राजे,

नारद करत निरांजन, घंटा ध्वनि बाजे । ओम् जय लक्ष्मी रमणा … ।।१।।

प्रकट भये कलिकारन, द्विज को दरस दियो,

बूढो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो ।

ओम् जय लक्ष्मी रमणा ॥२॥

दुर्बल भील कराल,जिन पर कृपा करी,

चंद्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपति हरी ।

ओम् जय लक्ष्मी रमणा … ।। ३ ।।

वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीनी,

सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीन्हीं ।

ओम् जय लक्ष्मी रमणा ||४||

भाव भक्ति के कारण, छिन छिन रूप धरियो, श्रद्धा धारण किन्ही, तिनके काज सरयो ।

ओम् जय लक्ष्मी रमणा 11 ५ 11

ग्वाल बाल संग राजा, बन में भक्ति करी, मन वांछित फल दीन्हो, दीनदयाल हरी ।

ओम् जय लक्ष्मी रमणा …।। ६ ।।

चढत प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा.

धूप-दीप-तुलसी से राजी सत्यदेवा। ॐ जय लक्ष्मी रमणा ।। 7।।

श्री सत्यानरायण जी की आरती जो कोई नर गावे, कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे । ओम् जय लक्ष्मीरमणा || ८ ||

Satyanarayan Katha PDF

सारांश

दोस्तों आज के लेख में हमने सत्यनारायण कथा के बारे में पूरी जानकारी दे दी है। तथा ऊपर Satyanarayan Katha PDF भी दिया हुआ है जिसे आप अपने मोबाइल में आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं।

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FAQ Of Satyanarayan Katha

सत्यनारायण कथा में कुल कितनी कहानियां है ?

सत्यनारायण कथा में कुल पांच अध्याय है जोकि आपको इस लेख में मिल जायेगा।

सत्यनारायण पूजा के लिए क्या पहने ?

सत्यनारायण की पूजा करने के लिए पुजारी को सफ़ेद वस्त्र या पीला वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।

सत्यनारायण की पूजा कब की जाती है ?

सत्यनारायण की पूजा को दिन या रात किसी भी समय किया जा सकता है।

satyanarayan katha pdf कहाँ से प्राप्त करे ?

satyanarayan katha pdf को आप www.pdfsewa.in वेबसाइट से प्राप्त कर सकते हैं।

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